खजनी ब्लाॅक: जनपद गोरखपुर (0प्र0) में भूमि उपयोग का वर्तमान प्रतिरूप

 

अनूप यादव1, डाॅ. प्रमोद कुमार तिवारी2

1जे.आर.एफ. शोध छात्र, भूगोल विभाग, नागरिक पी.जी., काॅलेज, जंघई, जौनपुर, 0प्र0

2एसो.प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, भूगोल विभाग, नागरिक पी.जी., काॅलेज, जंघई, जौनपुर, 0प्र0

*Corresponding Author E-mail: anoopyadav9190@gmail.com, pktiwari61@gmail.com

 

ABSTRACT:

भूमि सम्पूर्ण जीव जगत के जीवन का आधार एवं भौतिक संसाधनों का आधार है। प्राकृतिक संसाधनों में भूमि अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। प्राथमिक आवष्यकताओं की पूर्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसी संसाधन से होती हैं। मनुष्य की प्रारम्भिक अवस्था अथवा खाद्य संग्राहक व्यवस्था के बाद मानव सभ्यता के विकास के प्रथम सोपान से लेकर वर्तमान तक अनेकानेक वैज्ञानिक उपलब्धियों एवं तकनीक सुविधाओं से सम्पन्न मानव सभ्यता के मूल में भी भूमि का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। किसी स्थान विषेष की भूमि उपयोग की अवस्थायें उस क्षेत्र विषेष की तत्कालिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्था को द्योतक है। (पाण्डेय एस.के. पृ. 59) भूमि उपयोग एक गत्यामक पहलू है, जो भौतिक दषाओं में परिवार तथा मानव के सामाजिक-आर्थिक विकास, वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति के अनुरूप परिवर्तित, परिष्कृत एवं वारिमार्जित होता रहा है। यही कारण हंै कि किसी भी क्षेत्र का भूमि उपयोग उस क्षेत्र में निवास करने वाले मानव की बौद्धिक क्षमता तथा आर्थिक-सामाजिक एवं राजनीतिक विकास स्तर का सूचक होते हैं प्रस्तुत शोध पत्र में भूमि के उपयोग एवं दूरप्रयोग को दर्षाया गया है। भूमि संसाधन के संतुलित विकास को ध्यान में रखकर वर्तमान एवं भविष्य के लिए भावी रणनीति भी बनाया गया हैं।

 

KEYWORDS: भावी रणनीति, भूमि उपयोग, नियोजन, कृष्यबेकार भूमि।

 

 


प्रस्तावना %&

भूमि संसाधन एक सीमित प्राकृतिक संसाधन है, जिस पर दिन-प्रतिदिन बढ़ती जनसंख्या के भार के प्रभाव से विष्व के सभी विकसित एवं विकासषील देष चिन्तित है। वैज्ञानिक इस समस्या के समाधान हेतु बताते हैं कि विष्व के विभिन्न भागों में भूमि का विभिन्न कार्यों हेतु सन्तुलित एवं लाभप्रद उपयोग आवश्यक है। शीघ्र ही भूमि को संरक्षण में लेकर अनुकूलतम एवं अधिकतम उपयोग किया जाना चाहिए। अकृष्ट एवं बेकार भूमि को योग्य बनाकर एवं अच्छी भूमि गहन कृषि को अपनाने तथा कृषि में नवाचारों एवं नवीन प्रविधिक को अपना करके अधिक से अधिक उत्पादन किया जाना आवष्यक है। भूमि प्रयोग के मूल्यांकन एवं उसके आधार पर आदर्ष भूमि उपयोग के निर्धारण हेतु यह आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है कि विष्व के विभिन्न क्षेत्र में जिस रीति से विभिन्न उद्देष्यों की पूर्ति हेतु भूमि का उपयोग की जा रही है, उसकी व्याख्या की समीक्षा की जाये तभी भूत एवं वर्तमान के अनुभवों के आधार पर भविष्य की योजनाओं को नियंत्रित किया जा सकता है।

 

भूमि उपयोग वैज्ञानिक युग की उपलब्धियों से पूर्णतया प्रभावित है। भूमि उपयोग प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक उपादानों के संयोग का प्रतिफल है। ;टमदद्रमजजपए 1971द्ध किसी क्षेत्र विषेष मंे भूमि उपयोग प्रकृति प्रदत्त विषेषताओं के अनुरूप रहता है अर्थात् मानवीय क्रियाकलाप प्राकृतिक कारकों द्वारा निर्धारित होते हैं, तब तक भूमि का आर्थिक महत्व कम एवं जन-जीवन का स्तर निम्न होता है। कालाक्रम में जब भूमि उपयोग प्रारूप के निर्धारण में मानवीय भूमि की संसाधनता में वृद्धि हो जाती हैं और जनजीवन का आर्थिक स्तर अपेक्षाकृत उच्च हो जाता है। भूमि एक सीमित संसाधन है जिसकी उर्वरता में वृद्धि एक सीमित स्तर तक की जा सकती है। भूमि पर प्रतिदिन जनसंख्या भार बढ़ता जा रहा है, फलस्वरूप भूमि के अभिष्टतम उपयोग की आवष्यकता है। भूमि संसाधन उपयोग, भूमि समस्या और उसके नियोजन सम्बन्धी विवेचना की धूरी है। (बारत्वो एवं जाॅनलन)

 

भूमि उपयोग शब्द का प्रथम प्रयोग जोंस एवं फिंच द्वारा अपनी पुस्तक में 20वीं शताब्दी के प्रथम चरण में किया गया था। वास्तव में इसके अध्ययन को वास्तविक एवं व्यावहारिक महत्व डडले स्टैम्प के ग्रेट ब्रिटेन में भूमि सर्वेक्षण से प्राप्त हुआ, भारत में भूमि उपयोग के अध्ययन में एम0सफी0 और एम0एस0 भाटिया के कार्य महत्वपूर्ण रहे हैं। प्राचीन काल में मानव जीवन और भूमि उपयोग का पारस्परिक सम्बन्ध रहा है, परन्तु कृषि प्रधान देषों में प्रमुख समस्या सीमित साधनों एवं प्राकृतिक संसाधन विषेषतया भूमि उपयोगी क्षेत्र का अर्थतन्त्र संसाधनों के अभाव में मात्र कृषिगत संसाधनों पर आधारित है। फलतः इस क्षेत्र के भौगोलिक अध्ययन में कृषि भूमि उपयोग सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय हो जाता है। क्षेत्र विषेषता भूमि उपयोग की गहनता और उसमें परिवर्तन के विष्लेषण के द्वारा उसके विगत एवं वर्तमान विकास स्तर का ज्ञान हो सकता है। साथ ही साथ भावी विकास सम्भावनाओं का आंकलन किया जा सकता है। चूँकि भूमि की पूर्ति निष्चित है तथा भूमि पर जनसंख्या भार दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। अतः इसके विवेकपूर्ण तथा अभिष्ट उपयोग की आवष्यकता है। फलस्वरूप भूमि के सद्उपयोग एवं दुरूपयोग के विष्लेषण, मूल्यांकन एवं उसके आधार पर उपयोग के निर्माण हेतु यह आवष्यक हैं कि विभिन्न क्षेत्रों में जिस ढंग से विभिन्न उद्देष्यों की पूर्ति के लिए भूमि का उपयोग किया जा रहा है। उसकी व्याख्या एवं समीक्षा की जाये। इसी उद्देष्य को ध्यान में रखकर अध्ययन क्षेत्र में भूमि उपयोग की भौगोलिक व्याख्या की गयी है।

 

अध्ययन का उद्देष्य:

प्रस्तुत शोध प्रपत्र के मुख्य उद्देष्य भूमि संसाधन के उपयोग एवं खजनी विकास खण्ड में भूमि उपयोग के वर्तमान प्रतिरूप का अध्ययन किया गया है इस शोध प्रपत्र के अध्ययन का उद्देष्य निम्नलिखित है-

1. भूमि उपयोग को परिभाषित करना।

2. भूमि उपयोग प्रतिरूप का अध्ययन करना।

3. भूमि उपयोग के सन्तुलित उपयोग का अध्ययन करना।

 

अध्ययन का विधितंत्र:

प्रस्तुत शोध प्रबन्ध में विष्लेषणात्मक विधि का प्रयोग किया गया है। भूमि उपयोग के अध्ययन में विकास भवन से प्राप्त आँकड़ों का प्रयोग सांख्यिकीय पत्रिका, तथा विभिन्न प्रकार के शोध प्रपत्र को पढ़कर प्रस्तुत किया गया है इसके अलावा गुगल से प्राप्त आँकड़ों का भी प्रयोग किया गया जिससे ब्मदेने िप्दकपं एवं जिला हस्तपुस्तिका का प्रयोग किया गया है।

 

भूमि उपयोग प्रतिरूप:

किसी क्षेत्र में भूमि की वर्तमान स्थिति एवं परिस्थिति को देखकर ही भूमि उपयोग प्रतिरूप दर्षाया जा सकता है। अध्ययन क्षेत्र कृषि प्रधान क्षेत्र है, यहाँ के भूमि उपयोग पर धरातलीय बनावट, मिट्टी, जलवायु में ऋतुएं जैसे प्राकृतिक कारण का विषेष प्रभाव पड़ता है यहाँ पर मौसम के अनुसार कृषि क्षेत्र का धरातल बदलता रहता है। यहाँ के भूमि उपयोग पर जनसंख्या घनत्व, सिंचाई के साधन एवं परिवहन की व्यवस्था का भी विषेष प्रभाव पड़ता है। अध्ययन क्षेत्र में भूमि उपयोग प्रतिरूप का वर्णन जिला सांख्यिकी पत्रिका एवं सामाजिक-आर्थिक पत्रिका में प्रकाषित आँकड़े के आधार पर किया गया है।

 

वन:

वह हमारे जीव जगत के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। वन सम्पूर्ण प्राकृतिक एवं जैविक घटकों का आधार घटक है। मानव के लिए सामाजिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय दृष्टि से वनों का विषेष महत्व है। वनों के महत्व को देखते हुए राष्ट्रीय वन नीति में यह व्यवस्था की गयी है कि सम्पूर्ण भौगोलिक क्षेत्रफल के कम से कम 33 प्रतिषत वन होना चाहिए अर्थात् सम्पूर्ण पृथ्वी के एक तिहाई भाग संघन वनों से आच्छादित होने चाहिए। वनों का अनुपात पर्वतीय पठारी क्षेत्रों में 60 प्रतिषत तथा मैदानी क्षेत्रों में 20 प्रतिषत निर्धारित किया गया है। मानव की विविध आवष्यकताओं की पूर्ति के खजनी ब्लाॅक में भूमि उपयोग (हेक्टेयर में) वर्ष 2019-2020.

 

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अतिरिक्त परिस्थितिकी सन्तुलन, मृदा अपरदन एवं विभिन्न जंगली जीवों एवं जनजातियो ंके रहने के लिए घर में वनस्पतियों की भूमिका अति महत्वपूर्ण है। आज विष्व की तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या एवं उसकी आवष्यकताओं की पूर्ति के लिए वनों, बाग, बगीचों, उद्यानों तथा अन्य स्थानों पर उगी वृक्षों की अन्धाधुंध कटाई हो रही है। जिसके कारण पारिस्थितिकी सन्तुलन उत्पन्न हो गयी है।

खजनी विकासखण्ड के वनों का क्षेत्रफल 168 हेक्टेयर था जो सम्पूर्ण क्षेत्रफल का 1.04 प्रतिषत है। वनों के हृास का प्रमुख कारण वृक्षों की कटाई है। बढ़ती जनसंख्या के भरण-पोषण के लिए बागों एवं वृक्षों को काटकर घर, सड़क आदि का निर्माण किया जा रहा है, जिसके कारण इस क्षेत्र में वन नगण्य हो गये हैं। वनों के विकास के लिए सरकार को उचित वन नीति अपनाकर कम से कम 20 प्रतिषत क्षेत्रफल पर वन सुनिष्चित करना चाहिए। विकासखण्ड खजनी में वृक्षारोपण कार्यक्रम के अन्तर्गत वर्ष 2020 में 5000 पौधे 5 हेक्टेयर भूमि पर रोपित किये गये और 5 हजार क्षेत्र में अन्तिम मृदा कार्य कराया गया, इस प्रकार वृक्षारोपण कार्यक्रम के अन्तर्गत 780 मानव दिवस के रोजगार सृजित किये गये हैं। सम्पूर्ण क्षेत्र में आजकल लोग अपने खेती भी, लिप्ट्स, सागोन आदि के वृक्ष लगा रहे हैं।

 

कृषि योग्य बंजर भूमि -

इसके अन्तर्गत उस भूमि को रखा जाता है जो भूमि मृदा के दृष्टिकोण से उपजाऊ होते हुए भी कृषि के लिए उपलब्ध नहीं रहती। वैज्ञानिक अनुसंधानों नवीन कृषि मंत्रों सिंचाई के साधनों अभिनव तकनीकि एवं अन्य सुविधाओं के उपरान्त भी ऐसी भूमि को आर्थिक रूप से शुद्ध लाभ प्रदायी कृषिगत क्षेत्र के अन्तर्गत लाया जा सकता है। कृषि योग्य बेकार भूमि के विश्लेषण से स्पष्ट है कि किसी क्षेत्र के विकसित भूमि उपयोग प्रति-रूद एवं जनसंख्या में वृद्धि एवं हास के आधार पर इसमें परिवर्तन होता रहता है। तालिका के अनुसार खजनी विकासखण्ड में 262 हेक्टेयर भूमि इसके अन्तर्गत है जो कुल प्रतिवेदित भूमि का मात्र 1.63 प्रतिषत है।

 

वर्तमान परती भूमि:

वर्तमान परती के अन्तर्गत उस भूमि को रखा जाता है, जिससे पहले कृषि होती थी, लेकिन भूमि की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए उसे एक फसल के लिए परती छोड़ दिया जाता है। इससे भूमि की उर्वराषक्ति बनी रहती है। खजनी विकासखण्ड 2019-20 के आँकड़ों के अनुसार 926 हेक्टेयर भूमि, वर्तमान परती भूमि के अन्तर्गत आता है जो कुल प्रतिवेदित क्षेत्रफल का मात्र 5.77 प्रतिषत है।

 

अन्य परती:

अन्य परती भूमि भी कृषि योगय वह भूमि है जो एक वर्ष से अधिक लेकिन 5 वर्ष से कम समय के लिए कृषि फसल रहित रहती है। अर्थात् जब भूमि को एक वर्ष से अधिक परती छोड़ दी जाती है तो उस भूमि को अन्य परती भूमि के अन्तर्गत रखी जाती है। खजनी विकासखण्ड में अन्य परती भूमि के अन्तर्गत रखी जाती है। खजनी विकास खण्ड में अन्य परती भी के अन्तर्गत 181 हेक्टेयर भूमि है, जो कुल प्रतिवेदित क्षेत्रफल के मात्र 1.12 प्रतिषत ही है।

 

उषर एवं कृषि के अयोग्य भूमि:

जब कोई भूमि बिना किसी अन्य उपयोग में लाये 5 वर्ष से अधिक समय के लिए खेती में प्रयुक्त नहीं की जाती है, तो ऐसी भूमि को छठवें वर्ष कृषि बंजर भूमि या कृषि योग्य के अयोग्य भूमि के दर्ज कर लिया जाता है। इस श्रेणी के अन्तर्गत विवादित जमीन, किसान की अक्षमता एवं विवषता एवं सिंचाई के संसाधनों का अभाव, नदियों के मार्ग परिवर्तन से रेट की मोटी परत बिछ जाने से आदि कारणों से बेकार पड़ी भूमि इस श्रेणी के अन्तर्गत आती है। खजनी विकास खण्ड में ऊपर एवं कृषि के अयोग्य भूमि के अन्तर्गत 2019-20 में 248 हेक्टेयर क्षेत्र प्राप्त है। जो सम्पूर्ण प्रतिवेदित क्षेत्रफल का मात्र 1.54 प्रतिषत है।

 

चारागाह:

खजनी विकास खण्ड के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है और अधिकार किसान कृषि के अतिरिक्त पशुपालन भी करते हैं। कुछ किसान तो अधिक मात्रा में पशुपालन का कार्य करते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में खटाल की संज्ञा दी जाती है। ये किसान अपने दूध उत्पादन को नजदीक में स्थित गोरखपुर महानगर में अपने दूध की सप्लाई करते हैं। कुछ किसान या लगभग अधिकतर किसान एक या दो पशु पालते हैं। पशुओं को चराने के लिए यहाँ पर चारागाह का अभाव पाया जाता है। यहाँ के कृषक अधिकतर अपने पशुओं को चराने के लिए सोनरा ताल, बुकुची ताल, भदर्खी लाल के तलीय भाग में पशुओं को चराने के लिए ले जाते हैं। इन तालों में गर्मियों के मौसम स्थानीय किसान अपने पशुओं को छोड़ देते हैं, जो यहाँ दिन भर चराई करते हैं तथा शाम को उन्हें वापस घर ले आते हैं। इसके अलावा आमी नदी एवं तरैना नाला तथा कुआँनों नदी के तलीय भाग में भी पशुओं की चराई होती है। 2019-20 के तालिका के अनुसार खजनी विकासखण्ड में चारागाह के अन्तर्गत मात्र 5 हेक्टेयर भूमि को ही रखा जाता है।

 

कृषि के अतिरिक्त अन्य उपयोग की भूमि:

इसके अतिरिक्त आवास एवं कल कारखाने, सड़के, नहरे, स्कूलों, अस्पतालों आॅफिस आदि की भूमि को सम्मिलित किया जाता है। इस प्रकार की भूमि अधिग्रहण में प्रति वृद्धि की प्रवृत्ति देखी जा रही है। आज बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण लोगों को अतिरिक्त आवास, स्कूलों एवं सड़कों, अस्पतालों आदि की आवश्यकता पड़ती है। खजनी विकास खण्ड में 2020 के आँकड़ों के अनुसार 1909 हेक्टेयर क्षेत्र पर कृषि के अतिरिक्त अन्य उपयोग की भूमि है जो कुल प्रतिवेदित क्षेत्रफल का 11.89 प्रतिशत है।

 

उद्यानों, वृक्षों एवं झाड़ियों का क्षेत्रफल:

खजनी विकासखण्ड के अन्तर्गत इस प्रकार का क्षेत्र 2019-20 के आँकड़ों के अनुसार मात्र 150 हेक्टेयर है जो कुल प्रतिवेदित क्षेत्रफल का मात्र 0.76 प्रतिषत है। उद्यानों वृक्षों एवं साड़ियों के घटते क्षेत्रफल का प्रमुख कारण जनसंख्या है। लोग अपनी आवश्यकताओं के लिए, सड़क, मकान, स्कूल एवं अस्पताल आदि के निर्माण हेतु भूमि तथा लकड़ी प्राप्त करने के लिए पुराने वृक्षों जैसे पीपल, आम, महुआ, बरगद, नीम, पाकड़ आदि को काट दे रहे हैं तथा उनके स्थान पर नये वृक्षों को नहीं लगा रहे हैं, पुराने बांगों एवं स्थानीय क्षेत्र की झाड़ियों को खेत या मकान आदि बना ले रहे हैं।

 

शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल:

शुद्ध बोये गये क्षेत्रफल के अन्तर्गत वह भूमि आती है, जिस पर खेती की जाती है। शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल किसी क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास पर परिचायक होती है। सदियों से अध्ययन क्षेत्र की जनसंख्या का भरण-पोषण एवं अर्थव्यवस्था इसी कृषि पर निर्भर रही है। खजनी विकास खण्ड एक मैदान भू-भाग है, जो गंगा के मैदान में अवस्थित है। यहाँ की मानसूनी जलवायु, जलोढ़ निर्मित अत्यन्त समतल मैदान, उच्च जनसंख्या घनत्व आदि कारकों से कृषि के अन्तर्गत भूमि का क्षेत्रफल अधिक होना स्वभाविक है। खजनी विकास खण्ड में 2019-20 के आँकड़ों के अनुसार शुद्ध बोये गये क्षेत्रफल 12433 हेक्टेयर है। जो कुल प्रतिवेदित क्षेत्रफल का (76.05 प्रतिषत) लगभग एक तिहाई है।

 

उपरोक्त विवरणों के अतिरिक्त खजनी विकास खण्ड में भूमि उपयोग प्रतिरूप में एक बार से अधिक बोया गया क्षेत्रफल, सकल बोया गया क्षेत्रफल, शुद्ध सिंचित क्षेत्रफल तथा सकल सिंचित क्षेत्रफल का भी अध्ययन किया गया है, जिसकी तालिका नीचे दी गयी है।

 

निष्कर्ष:

भूमि सम्पूर्ण जीव जगत के जीवन का आधार है अतः भूमि का उपयोग इस प्रकार करना चाहिए कि यह वर्तमान आवष्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ भावी पीढ़ी के लोगो के लिए इसका सुरक्षित उपयोग हो सके। खजनी विकास खण्ड के भूमि उपयोग प्रतिरूप के आँकड़ो को देखा जाय तो सम्पूर्ण भूमि लगभग 76 प्रतिषत भाग पर कृषि कार्य तथा लगभग 12 प्रतिषत बड़े भाग पर मकानो एवं सड़को आदि का निर्माण किया गया है तथा सम्पूर्ण भूमि के मात्र 2 प्रतिषत भाग पर ही वन एवं वृक्षादन का कार्य किया गया है। अतः सम्पूर्ण क्षेत्र पर देखा जाय तो जनसंख्या भार इतना अधिक है उनके भरण-पोषण के लिए 76 प्रतिषत भाग वह कृषि होती है जो एक गहन निर्वाहन कृषि प्रकार है; जिससे भ्ण्ल्ण्टण् बीजों का प्रयोग तथा बड़ी मात्रा में रासायनिक खाद्य एवं कीटनाषक का प्रयोग किया जा रहा है। भूमि पर्यावरण बिगड़ रहा है तथा अनेक प्रकार की बीमारियों रोगों आदि का सामना करना पड़ रहिा है। आज हर व्यक्ति अस्वस्थ्य होता जा रहा है। जिसका प्रमाण अभी हाल के वर्षोें में कोरोना महामारी का प्रकोप देखा जा रहा है। वृक्षों एवं वनों का प्रतिषत काफी कम हैं जिसके परिणाम स्वरुप पर्यावरणीय सन्तुलन बिगड़ता जा रहा है। अतः इन सब भयावह परिस्थितियों को ध्यान में रखकर भूमि उपयोग की वर्तमान प्रतिरुप को परिवर्तित एवं संषोधित करने की आवष्यकता है। जिससे वनों का प्रतिषत कम से कम 20 प्रतिषत तक किया जा सकें। इन सब परिस्थितियों को ध्यान में रखकर वर्तमान समय में प्रभावी नियोजन एवं योजना बनाने की आवष्यकता है तथा जनसंख्या नियंत्रण योजना को प्रभावी ढं़ग से लागू करने की जरुरत है जिसमें हर नीति को कानूनी रूप से मानने पर दण्ड का प्रावधान किया जाना चाहिए, ताकि हम भविष्य के लिए पृथ्वी एवं उस पर जीवन को सुरक्षित रख सके।

 

संदर्भ ग्रन्थ सूची

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5.       Pandey R. (1981) Land Utilization in Basgaon to Tehsil Gorakhpur District,

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7.       यादव विरेन्द्र प्रताप एवं गोस्वामी, के.पी. (2011) ’’जनसंख्या वृद्धि एवं भूमि उपयोग परिवर्तन-करंजाकला, जनपद जौनपुर’’ नार्थ इण्डियन ज्योग्ताकिकल जर्नल अंक 41, सं. 1 पृष्ठ 17-22

8.       राव बी0 पी0 एवं त्यागी नूतन (2014): भारत की भौगोलिक समीक्षा, बसुन्धरा प्रकाषन, गोरखपुर।

 

 

 

 

Received on 12.09.2022         Modified on 17.10.2022

Accepted on 14.11.2022          © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2022; 10(3):101-106.